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बेंगलुरु के स्कूलों में मां की नौकरी पर सवाल: क्या हाउसवाइफ हैं तो ही एडमिशन पक्का?

शहर के कुछ स्कूलों में कथित 'अनौपचारिक नियम' पर अभिभावक ने उठाया सवाल, कामकाजी माओं के बच्चों के एडमिशन पर असर की आशंका।

झटपट समझें

बेंगलुरु के कुछ स्कूलों में एडमिशन के लिए मां का हाउसवाइफ होना जरूरी माना जा रहा है, जिससे कामकाजी माओं के बच्चों के एडमिशन पर सवाल उठ रहे हैं।

मुख्य बातें

  • बेंगलुरु के कुछ स्कूलों में एडमिशन के लिए मां का घर पर रहना जरूरी माना जाता है।
  • अगर मां नौकरी करती हैं, तो बच्चे का आवेदन खारिज होने का खतरा रहता है।
  • यह नियम कागजों पर नहीं है, बल्कि स्कूलों का एक अनौपचारिक फिल्टर है।
  • कुछ अभिभावकों ने मां की नौकरी की जानकारी छिपाने की सलाह दी, जिसे अस्वीकार कर दिया गया।
  • स्कूल हर साल मां की नौकरी की स्थिति पूछते हैं, जिसका तर्क बच्चों पर नजर रखना बताया जाता है।
मां हाउसवाइफ है या... जॉब करती है तो बच्चे का एडमिशन मुश्किल! बेंगलुरु के स्कूलों पर उठे सवाल
बेंगलुरु के स्कूलों में एडमिशन प्रक्रिया को लेकर अभिभावकों के बीच चर्चा।

कभी-कभी कोई छोटा सा फॉर्म भरते समय भी दिल बैठ जाता है। बेंगलुरु के एक अभिभावक के साथ कुछ ऐसा ही हुआ। ढाई साल की बेटी के स्कूल का रास्ता खोजते-खोजते वे एक ऐसे सवाल से जा टकराए, जो कागजों पर नहीं लिखा था, लेकिन घर के अंदर तक चुभ गया। सवाल यह नहीं था कि बच्ची पढ़ पाएगी या नहीं। सवाल यह था कि उसकी मां नौकरी करती हैं या घर पर रहती हैं। दरअसल, बेंगलुरु के एक अभिभावक ने शहर के कुछ स्कूलों में चल रहे कथित 'बिना लिखे नियम' पर गंभीर सवाल उठाया है। उनके मुताबिक, कुछ स्कूल उन बच्चों को दाखिले में तरजीह देते हैं जिनकी मां घर पर रहती हैं, यानी हाउसवाइफ हैं। अगर मां नौकरी करती हैं, तो बच्चे का आवेदन खारिज भी हो सकता है। यह बात सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन गई है। दरअसल, यह मामला रेडिट पर ‘बैंगलोर में स्कूल’ शीर्षक वाली एक पोस्ट से सामने आया।

पोस्ट लिखने वाले अभिभावक ने बताया कि उनकी ढाई साल की बेटी है और वे हाल ही में उसके स्कूल के विकल्प तलाशने लगे हैं। इसी प्रक्रिया में उन्हें बनशंकरी इलाके के कुछ स्कूलों के बारे में पता चला। उनके अनुसार, इन स्कूलों में कागजों पर ऐसा कोई नियम नहीं लिखा है, लेकिन व्यवहार में एक अनौपचारिक फिल्टर चलता है। इस फिल्टर के तहत मां का घर पर रहना जरूरी माना जाता है। अगर मां कामकाजी हैं, तो आवेदन आगे नहीं बढ़ने का खतरा रहता है।

पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता ने क्या कहा? अभिभावक ने दावा किया कि उन्होंने ऐसे ही एक स्कूल में पढ़ने वाले बच्चों के माता-पिता से बात की। उन अभिभावकों ने बताया कि यह बात स्कूल में एक तरह का 'खुला राज' है। यानी ज्यादातर लोग जानते हैं, लेकिन खुलकर इसका जिक्र नहीं करते। कुछ अभिभावकों ने उन्हें यह भी सलाह दी कि अगर बेटी का दाखिला करवाना है, तो फॉर्म में मां की नौकरी की जानकारी छिपा दें या गलत लिख दें। पोस्ट लिखने वाले अभिभावक ने कहा कि यह सलाह उन्हें बिल्कुल ठीक नहीं लगी। उन्होंने साफ कहा कि झूठ लिखकर दाखिला लेना उनके लिए स्वीकार्य नहीं है।

उन्होंने एक और गंभीर आरोप लगाया। उनके मुताबिक, ये स्कूल सिर्फ दाखिले के समय ही नहीं, बल्कि हर साल मां की नौकरी की स्थिति पूछते हैं। स्कूल का तर्क यह बताया जाता है कि वे बच्चों पर नजर रखना चाहते हैं और यह देखना चाहते हैं कि घर पर बच्चे की देखभाल कौन कर रहा है। अभिभावक का कहना है कि इस सोच के पीछे एक पुरानी मान्यता छिपी हुई है कि बच्चे की पढ़ाई और देखरेख मुख्य रूप से मां की जिम्मेदारी है, और कामकाजी मां इस जिम्मेदारी को ठीक से नहीं निभा सकतीं।

अभिभावक ने सवाल किया कि अगर किसी संस्थान की पहली सोच यह है कि महिलाओं को काम नहीं करना चाहिए, तो वह छात्रों को आखिर क्या मूल्य सिखाएगा? उन्होंने आगे लिखा कि बेंगलुरु को देश की टेक राजधानी और आधुनिक शहरों में से एक माना जाता है। ऐसे शहर में यह सोच देखकर वे हैरान हैं। उनके अनुसार, सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि कई लोग इसे सामान्य मानकर चुपचाप स्वीकार कर लेते हैं।

सोशल मीडिया पर चर्चा तेज इस पोस्ट के बाद कई अभिभावकों ने प्रतिक्रिया दी। कुछ लोगों ने कहा कि माता-पिता को ऐसी प्रथा को चुपचाप मानने की बजाय चुनौती देनी चाहिए। एक यूजर ने कमेंट में लिखा कि ये स्कूल इसलिए बच निकलते हैं क्योंकि ज्यादातर माता-पिता या तो नियम मान लेते हैं या विवाद से बचने के लिए चुपचाप आगे बढ़ जाते हैं। दूसरे ने कमेंट में लिखा कि इन स्कूलों के नाम सामने लाए जाएं, उन्हें शर्मिंदा किया जाए, शिकायत दर्ज कराई जाए और इस मुद्दे पर आवाज उठाई जाए।

चर्चा केवल दाखिले तक सीमित नहीं रही। कुछ यूजर्स ने स्कूल के शिक्षण स्टाफ का भी जिक्र किया। एक यूजर ने लिखा कि अभिभावक स्कूल प्रबंधन से पूछें कि वहां कितनी शिक्षिकाएं खुद मां हैं। अगर स्कूल की शिक्षिकाएं काम भी करती हैं और घर की जिम्मेदारी भी संभालती हैं, तो फिर कामकाजी मां के बच्चे का दाखिला रोकने का तर्क कैसे सही माना जा सकता है।

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