संतोष आर्यन, पिथौरागढ़ उच्च हिमालय के बर्फीले बुग्यालों से जान जोखिम में डालकर जुटाए जाने वाले लाल सोने यानि कीड़ा जड़ी के कारोबार पर चीन का ग्रहण लग चुका है। तीन साल पहले तक जिस कीड़ा-जड़ी का मूल्य धारचूला और मुनस्यारी ब्लॉकों के हजारों ग्रामीणों को 10 लाख रुपये प्रति किलोग्राम तक मिल रहा था, उसके दाम अब घटकर आधे यानी पांच लाख रुपये प्रति किलोग्राम के करीब पहुंच गया है।
दामों में आई इस 50 फीसदी की गिरावट के पीछे चीन का स्वदेशी स्तर पर शुरू किया गया कीड़ा-जड़ी का उत्पादन और वहां से घटती मांग को मुख्य वजह माना जा रहा है। सीमांत के नेपाल और चीन सीमा पर बसे धारचूला और मुनस्यारी ब्लॉकों के हजारों ग्रामीणों के लिए कीड़ा-जड़ी आजीविका का मुख्य स्रोत है।
15 हजार फीट पर बर्फीले बुग्यालों में मिलती है कीड़ा जड़ी हर साल मई से जून माह के दौरान हजारों ग्रामीण अपने घरों को छोड़कर 12 हजार से 15 हजार फीट की ऊंचाई पर स्थित बर्फीले बुग्यालों की ओर रुख करते हैं। हाड़ कंपा देने वाली ठंड, ऑक्सीजन की कमी और दुर्गम रास्तों के बीच दो महीने तक अपनी जान हथेली पर रखकर ग्रामीण कीड़ा जड़ी का दोहन करते हैं। यह जड़ी-बूटी ही सालभर उनके परिवारों के भरण-पोषण, राशन और बच्चों की पढ़ाई का एकमात्र सबसे बड़ा जरिया है, लेकिन वर्ष 2023 से कीड़ाजड़ी का घटता मूल्य ग्रामीणों को आर्थिक नुकसान पहुंचा रहा है। कारोबारियों ने बताया कि स्थानीय स्तर पर ठेकेदारों ने उनसे पांच लाख के हिसाब के कीड़ाजड़ी खरीदी है।
स्टेमिना बूस्टर मानी जाती है कीड़ा-जड़ी पिथौरागढ़। कीड़ा-जड़ी को सबसे ताकतवर प्राकृतिक एनर्जी और स्टेमिना बूस्टर माना जाता है। चीन में इसका इस्तेमाल न केवल पारंपरिक चीनी चिकित्सा में होता है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय खेल आयोजनों में भी इसका बड़ा रोल रहा है। कहा जाता है कि ओलंपिक खेलों के दौरान चीन अपने एथलीटों का प्रदर्शन और शारीरिक क्षमता बढ़ाने के लिए उन्हें भारी मात्रा में कीड़ा-जड़ी का सेवन कराता है। इस प्राकृतिक जड़ी-बूटी की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह खिलाड़ियों की शारीरिक क्षमता को कई गुना बढ़ा देती है। आधुनिक एंटी-डोपिंग जांच में यह पकड़ में नहीं आती।
नेपाल के रास्ते चीन तक सप्लाई चेन पिथौरागढ़ । कीड़ा-जड़ी कारोबार से जुड़े स्थानीय व्यापारियों के अनुसार, हिमालयी इलाकों से निकलने वाली प्राकृतिक कीड़ा-जड़ी का सबसे बड़ा खरीदार चीन ही रहा है। सीमांत से यह मूल्यवान कीड़ा-जड़ी अवैध रास्तों से पहले नेपाल पहुंचाई जाती है और फिर नेपाल के तस्करों के नेटवर्क के जरिए चीन के बाजारों में सप्लाई होती है। कारोबारियों का कहना है कि चीन ने हाल के वर्षों में प्रयोगशालाओं और नियंत्रित वातावरण में कीड़ा-जड़ी का वैज्ञानिक उत्पादन शुरू कर दिया है। चीन में स्थानीय उत्पादन शुरू होने से भारत की ओर से जाने वाली प्राकृतिक कीड़ा-जड़ी की मांग में भारी गिरावट आई है। मांग घटते ही बिचौलियों ने इसके दाम आधे कर दिए हैं, जिसका सीधा असर सीमांत ग्रामीणों की जेब पर पड़ रहा है।

