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स्लीपर बस में आग: 9 मौतें, यात्री क्यों फंस जाते हैं?

बुधवार देर रात यमुना एक्सप्रेसवे पर एक AC स्लीपर बस में आग लगने से 9 यात्रियों की मौत हो गई। यह घटना स्लीपर बसों की सुरक्षा पर गंभीर सवाल खड़े करती है, खासकर आग लगने की स्थिति में यात्रियों के फंस जाने के कारणों पर।

झटपट समझें

स्लीपर बसों में आग लगने की कई वजहें हैं, जिनमें शॉर्ट सर्किट, लोकल वायरिंग और ओवरलोडिंग प्रमुख हैं। जुगाड़ से बनी बसें, जिनमें सुरक्षा मानकों की अनदेखी होती है, आग लगने का खतरा बढ़ाती हैं। इसके अलावा, बसों की बनावट (संकरी गैलरी, कम ऊंचाई) और इमरजेंसी एग्जिट की कमी के कारण आग लगने पर यात्रियों का बाहर निकलना मुश्किल हो जाता है।

मुख्य बातें

  • बुधवार देर रात यमुना एक्सप्रेसवे पर AC स्लीपर बस में आग लगने से 9 यात्रियों की मौत।
  • आग का कारण एसी में स्पार्क या इंजन ऑयल में आग लगना बताया जा रहा है।
  • पिछले 3 सालों में चलती बसों में आग लगने की 45 घटनाओं में 64 लोगों की मौत।
  • स्लीपर बसों में आग लगने के मुख्य कारण: शॉर्ट सर्किट, लोकल वायरिंग, ओवरलोडिंग और जुगाड़ से बनी बसें।
  • बसों की बनावट (संकरी गैलरी, कम ऊंचाई) और इमरजेंसी एग्जिट की कमी से यात्री फंस जाते हैं।
  • सुरक्षा मानकों का पालन न होना और ढीली जांच प्रणाली हादसों को बढ़ा रही है।
यमुना एक्सप्रेसवे पर आग की लपटों में घिरी स्लीपर बस
बुधवार देर रात यमुना एक्सप्रेसवे पर दयानातपुर गांव के पास आग की चपेट में आई स्लीपर बस। इस हादसे में 9 लोगों की जान चली गई।

बुधवार देर रात यमुना एक्सप्रेसवे पर ग्रेटर नोएडा के जेवर में दयानातपुर गांव के पास एक AC स्लीपर बस में आग लगने से 9 यात्रियों की दर्दनाक मौत हो गई। 35 यात्रियों को लेकर नोएडा से बुंदेलखंड के महोबा जा रही यह बस देखते ही देखते स्वाहा हो गई। पुलिस के मुताबिक, बस के एसी में स्पार्क या ब्लास्ट होने के बाद इंजन ऑयल ने आग पकड़ ली, जिससे लपटें बेहद तेजी से पूरी बस में फैल गईं।

यह कोई अकेली घटना नहीं है। इससे पहले दिसंबर 2025 में मथुरा में घने कोहरे के कारण यमुना एक्सप्रेसवे पर टकराई बसों में आग लगने से 13 लोगों की जान चली गई थी। वहीं अक्टूबर 2025 में आंध्र प्रदेश के कुरनूल में बाइक की टक्कर के बाद स्लीपर बस में आग लगने से 20 और जैसलमेर से जोधपुर जा रही प्राइवेट बस में आग से 26 लोग जिंदा जल गए थे। हाल ही में संसद में दिए गए एक जवाब के मुताबिक, बीते तीन सालों में चलती बसों में आग लगने की 45 घटनाओं में कम से कम 64 लोग अपनी जान गंवा चुके हैं। राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) भी राज्यों के मुख्य सचिवों को नोटिस जारी कर फायर सेफ्टी नियमों का उल्लंघन करने वाली स्लीपर बसों पर कार्रवाई का निर्देश दे चुका है।

भारत की सड़कों पर हमेशा से स्लीपर बसें नहीं चलती थीं। 1966 के आसपास मैसूर स्टेट रोड ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन जैसी सरकारी संस्थाओं ने दक्षिण भारत में इसके शुरुआती प्रयोग किए थे। असली उछाल 2000 के दशक में आया, जब नेशनल हाईवे चार-लेन के बनने लगे और रातों-रात अंतरराज्यीय सफर आसान हो गया। 2010 के बाद जब लंबी दूरी की ट्रेनों में कन्फर्म टिकट मिलना दूभर हुआ, तो स्लीपर बसों ने इस खाली जगह को भर दिया। 'रेडबस' (RedBus) के आंकड़ों के मुताबिक, 2025 में 6,000 से ज्यादा प्राइवेट ऑपरेटरों के जरिए 14 करोड़ से ज्यादा लोगों ने सफर किया, जिनमें 85% सफर स्लीपर और हाइब्रिड बसों में हुए। आज देश में लगभग 20 लाख बसें हैं, जिनमें से 90% से ज्यादा प्राइवेट ऑपरेटर चला रहे हैं। हालांकि, इस तेजी से बढ़ते सेक्टर में सुरक्षा नियमों की भारी अनदेखी हो रही है।

परिवहन विशेषज्ञों के अनुसार, हादसों के बाद लगने वाली आग और बिना किसी टक्कर के लगने वाली आग में बड़ा अंतर होता है। दिल्ली के पूर्व डिप्टी ट्रांसपोर्ट कमिश्नर अनिल छिकारा बताते हैं, "ज्यादातर स्लीपर बसों में आग शॉर्ट सर्किट या इलेक्ट्रिकल ओवरलोड के कारण लगती है, जिसे आसानी से रोका जा सकता है। कई बार वायरिंग फॉल्ट या ओवरहीटिंग से छोटी-मोटी आग लगती है, यात्री बाहर निकल जाते हैं और मामले की कोई गंभीर जांच तक नहीं होती।"

लोकल AC स्लीपर बसों में आग लगने के मुख्य कारण हैं: जुगाड़ से बनी बसें (OEM की बसों की कीमत लगभग 2 करोड़ रुपए होती है, जबकि लोकल बॉडी बिल्डरों से साधारण चेसिस पर तैयार कराई गई बसें 1 करोड़ रुपए से भी कम में बन जाती हैं), लोकल वायरिंग और ओवरलोड (कंपनियां लोड बांटने के लिए 'मल्टीप्लेक्स वायरिंग' का इस्तेमाल करती हैं, जबकि लोकल बॉडी बिल्डर सस्ते तारों का इस्तेमाल करते हैं), और इमरजेंसी हैमर व अलार्म की कमी (जुगाड़ से बनी बसों में कांच तोड़ने वाले हथौड़े और ऑटोमैटिक फायर सेपरेशन सिस्टम गायब रहते हैं)।

आग लगने के बाद स्लीपर बस के भीतर तबाही मचाने की सबसे बड़ी वजह उसकी अंदरूनी बनावट है। संकरी गैलरी, ऊपर-नीचे बनी बर्थ और कम ऊंचाई के कारण इमरजेंसी में यात्रियों का बाहर भागना नामुमकिन हो जाता है। नियमों के मुताबिक बस में कई इमरजेंसी एग्जिट होने चाहिए। लेकिन ऑपरेटर ज्यादा टिकटें बेचने और एक्स्ट्रा बर्थ लगाने के चक्कर में पीछे के इमरजेंसी दरवाजों को स्थाई रूप से बंद कर देते हैं। धुएं और आग के बीच यात्री सीधे खड़े होकर भाग भी नहीं पाते, उन्हें रेंगकर बाहर निकलना पड़ता है।

भारत में 'बस बॉडी कोड' (AIS-052), 'स्लीपर बस कोड' (AIS-119) और 'फायर डिटेक्शन सिस्टम' (AIS-134) जैसे सख्त मानक मौजूद हैं। लेकिन जमीन पर इनका पालन केवल कागजों तक सीमित है। लोकल बोड मेकर की तरफ से बस बनाने में फोम जैसे ज्वलनशील पदार्थों का इस्तेमाल किया जाता है, जो आग को भड़काने का काम करते हैं। आरटीओ दफ्तरों में इलेक्ट्रिकल और फायर सेफ्टी जांचने के लिए ट्रेंड इंजीनियरों की भारी कमी है। कई राज्यों में क्लर्क स्तर के कर्मचारी ही फिटनेस सर्टिफिकेट बांट रहे हैं। कई ऑपरेटर पूर्वोत्तर के राज्यों से बिना किसी वास्तविक फिजिकल टेस्ट के फिटनेस सर्टिफिकेट बनवा लेते हैं और हजारों किलोमीटर दूर बसें चलाते हैं।

बढ़ते हादसों को देखते हुए केंद्रीय सड़क परिवहन मंत्रालय ने हाल ही में ऑपरेटरों के साथ बैठक में लोकल स्तर पर कस्टमाइज की जाने वाली स्लीपर बसों पर पूरी तरह से प्रतिबंध लगाने और सिर्फ कंपनियों की तरफ से निर्मित (OEM) बसों को ही हरी झंडी देने के विचार पर चर्चा की है। गौरतलब है कि चीन ने भी 2012 में भीषण सड़क हादसों के बाद सभी तरह की स्लीपर बसों की बिक्री पर पूरी तरह से रोक लगा दी थी।

राजस्थान के 'रोड सेफ्टी नेटवर्क' से जुड़े विशेषज्ञ मधुसूदन शर्मा कहते हैं, "इन बसों में सफर करने वाले ज्यादातर वे आम लोग होते हैं जो महंगे साधन अफोर्ड नहीं कर सकते और जिन्हें ट्रेन में कंफर्म टिकट नहीं मिलता। वे सुरक्षा के भरोसे पर सफर करते हैं। जब तक लोकल बॉडी बिल्डरों और आरटीओ की लापरवाही पर कड़ा शिकंजा नहीं कसा जाएगा, तब तक सड़कों पर ऐसे हादसों को रोकना नामुमकिन होगा।"

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