कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) के संस्थापक और राष्ट्रीय संयोजक अभिजीत दीपके ने मंगलवार को अचानक अपने आंदोलन पर ब्रेक लगाकर सबको चौंका दिया। दीपके ने भले ही त्योहार के समय परिवार संग वक्त बिताने की सलाह देते हुए 'कॉकरोचों' को घर लौट जाने को कहा है, लेकिन उनकी यह दलील इतनी मजबूत नहीं कि सवालों को उत्पन्न होने से रोक सके। ऐसे में यह बड़ा सवाल अब भी कायम है कि ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा लिए बिना पीछे नहीं हटने की बात कहने वाले दीपके ने अचानक कदम क्यों रोक दिए?
अपनों की चोट से पैदा हुआ डर अभिजीत दीपके के इस फैसले के पीछे उस कथित चोट की भी खूब चर्चा हो रही है, जो ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन की प्रमुख नेहा बोरा और वरिष्ठ वकील प्रशांत भूषण ने आंदोलन को दी। माना जा रहा है कि जिस तरह भूषण और बोरा ने रेजीम चेंज और बांग्लादेश के जेन जी आंदोलन से सीख लेने की बात कही उससे सीजेपी के नेतृत्व में इस बात का डर उत्पन्न हो गया था कि उनके आंदोलन पर अब 'साजिशों' का धब्बा चस्पा किया जा सकता है। संभवत: उन्होंने इस बात की चिंता रही होगी कि आम लोगों के मन में आंदोलन के उद्देश्यों को लेकर आशंका बढ़ जाएगी और इस वजह से उन्होंने फिलहाल इसे स्थगित करना ही बेहतर समझा ताकि कुछ दिनों बाद नए सिरे से इसकी शुरुआत की जाए।
अपनों की फिक्र में एक दांव दीपके की ओर से आंदोलन पर लगाए गए ब्रेक को एक दांव के रूप में भी कुछ एक्सपर्ट देख रहे हैं। माना जा रहा है कि सौरभ दास और आशुतोष रांका को जल्द से जल्द से जेल से बाहर लाने के लिए भी उन्होंने इस तरह का संदेश दिया है कि फिलहाल आंदोलन की बजाय वे परिवार के साथ वक्त बिताएंगे। स्पेशल एग्जीक्युटिव मजिस्ट्रेट की अदालत ने सोमवार को सुनवाई के दौरान कहा था कि उन्हें इस बात का भरोसा नहीं है कि यदि सौरभ और आशुतोष को रिहा कर दिया जाए तो वह पिछली बार की तरह कानून का उल्लंघन नहीं करेंगे। ऐसे में संभव है कि बुधवार की पेशी से ठीक पहले दीपके ने आंदोलन पर ब्रेक की घोषणा करके दोनों सह-संयोजक के बाहर निकलने का रास्ता साफ करने की कोशिश की है।
‘अपनों’ का अभाव तो नहीं दिखा? अभिजीत दीपके की ओर से उठाए गए कदम को लेकर एक वजह यह भी गिनाई जा रही है कि ज्ञानेश कुमार के मुद्दे पर कॉकरोच जनता पार्टी को अपेक्षित समर्थन नहीं मिल रहा था। 10 अक्टूबर को जब संगठन ने जंतर-मंतर पर बड़े आंदोलन की घोषणा की पुलिस के इंतजामों को चुनौती देने के लिए महज कुछ हजार लोग ही सड़कों पर उतरे। पीटीआई ने उस दिन खबर दी थी कि दिल्ली में करीब 7 हजार लोगों को हिरासत में लिया गया, जबकि 20 जुलाई को सीजेपी के 'संसद चलो' मार्च के दौरान बड़ी संख्या में युवा सड़कों पर उतरे थे और उस हुजुम को रोकना मुश्किल हो गया था। इसके अलावा 16 अक्टूबर को जब सीपी में 'लहरा दो तिरंगा' कार्यक्रम की घोषणा की गई तो समर्थक से अधिक विरोध करने वाले लोग ही नजर आए।
प्रकाशित: बुधवार, 21 अक्टूबर 2026 | 12:27 PM IST

