ज्ञानेश कुमार के खिलाफ सुनवाई टली, सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग को फिर नोटिस दिया

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने 10 दिन का समय दिया है।

एक व्यक्ति सुप्रीम कोर्ट के सामने बोल रहा है, उसके सामने दो माइक्रोफोन हैं।
मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार से जुड़े मामले में सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई टाल दी है।
मुख्य बातें

मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई टल गई है क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता को निर्वाचन आयोग के जवाब पर अपना पक्ष रखने के लिए 10 दिन का समय दिया है। अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को होने की संभावना है।

  • मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के खिलाफ याचिकाओं पर सुनवाई टल गई है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने याचिकाकर्ता राकेश सिंह को निर्वाचन आयोग के जवाब पर पक्ष रखने के लिए 10 दिन का समय दिया है।
  • मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को होने की संभावना है।
  • याचिकाओं में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और मतदाता सूची से नाम हटाने पर सवाल उठाए गए हैं।
  • सुनवाई के दौरान कोर्ट ने ऑडियो-वीडियो बंद करवा दिया था।
  • सुप्रीम कोर्ट ने ECI को सभी याचिकाओं पर फिर से नोटिस जारी किया है।

मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार के खिलाफ दायर याचिकाओं पर सुनवाई टल गई है। मुख्य न्यायाधीश (CJI) सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली पीठ ने याचिकाकर्ता राकेश सिंह को निर्वाचन आयोग के जवाब पर अपना पक्ष रखने के लिए 10 दिन का समय दिया है। मामले की अगली सुनवाई 17 नवंबर 2026 को होने की संभावना है। हालांकि, अंतिम तारीख अदालत की सूची के अनुसार तय होगी।

आज सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता राकेश सिंह की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने अदालत से जवाब दाखिल करने के लिए समय मांगा। उनका कहना था कि निर्वाचन आयोग ने अपना जवाबी हलफनामा पिछली रात ही दाखिल किया है। ऐसे में याचिकाकर्ता को उसका अध्ययन करने और जवाबी हलफनामा यानी रिजॉइंडर दाखिल करने के लिए पर्याप्त समय दिया जाना चाहिए।

अदालत ने यह मांग स्वीकार करते हुए 10 दिन की मोहलत दे दी। इस कारण मामले में फिलहाल गुण-दोष के आधार पर कोई अंतिम फैसला नहीं हुआ है। अब अगली सुनवाई में याचिकाकर्ताओं के जवाब और निर्वाचन आयोग के पक्ष पर आगे विचार किया जा सकता है। इस मामले में लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी और इंडिया गठबंधन के अन्य नेताओं की याचिकाएं भी शामिल हैं। इन याचिकाओं में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली, मतदाता सूची से नाम हटाने और SIR से जुड़ी कथित अनियमितताओं पर सवाल उठाए गए हैं।

सुनवाई के दौरान बंद हुआ ऑडियो-वीडियो

लाइव लॉ की रिपोर्ट के मुताबिक, सुनवाई के एक बड़े हिस्से के दौरान कोर्ट ने ऑडियो-वीडियो बंद करवा दिया था। जब मामला खत्म होने वाला था, तब ऑडियो-वीडियो चालू किया गया, जिसमें वरिष्ठ वकील डॉ. ए.एम. सिंघवी और मेनका गुरुस्वामी मौजूद दिखे। फाइल नोटिंग और अन्य रिकॉर्ड को सुरक्षित रखने की मांग की गई है।

इससे पहले याचिकाकर्ता सांसद डोला सेन की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता डॉ. मेनका गुरुस्वामी ने कोर्ट से कहा कि यह मामला ECI के कामकाज से जुड़ा है, जिसमें ऑनलाइन 'फॉर्म 6' के साथ छेड़छाड़ करना और EC का एक प्रेस नोट जारी करना शामिल है। ईसीआई के प्रेस नोट में कहा गया है कि आपकी पीठ (अदालत) ने ऐसी छेड़छाड़ को अधिकृत किया है।

इस पर CJI ने कहा कि हम इसकी जांच करेंगे। तभी वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने जवाब दाखिल करने के लिए 1 हफ्ते का समय मांगा जिसे सीजेआई ने मंजूर कर लिया। इसके साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने ECI को सभी याचिकाओं पर फिर से नोटिस जारी किया है।

क्या है पूरा मामला? समझिए

शीर्ष अदालत राहुल गांधी समेत विपक्षी नेताओं और अन्य याचिकाकर्ताओं की अर्जियों पर सुनवाई कर रही है। इन याचिकाओं में आरोप लगाया गया है कि निर्वाचन आयोग के कुछ फैसले लेने की प्रक्रिया में पारदर्शिता की कमी रही और मतदाता सूची में बदलाव के दौरान गंभीर अनियमितताओं की आशंका है।

विवाद का केंद्र केवल मतदाता सूची से नाम हटाने का मुद्दा नहीं है। इससे जुड़े कई सवाल हैं: क्या निर्वाचन आयोग के फैसले नियमानुसार सामूहिक सहमति से लिए गए? क्या मतदाताओं के नाम हटाने की प्रक्रिया पारदर्शी रही? क्या नए मतदाताओं के पंजीकरण के नियमों में बदलाव किया गया? और क्या आयोग के रिकॉर्ड की स्वतंत्र जांच होनी चाहिए?

दूसरी ओर, निर्वाचन आयोग ने अपने हलफनामे में एकतरफा फैसले लेने के आरोपों को खारिज किया है। आयोग का कहना है कि SIR से संबंधित फैसले तीनों सदस्यों की सर्वसम्मति से लिए गए और फॉर्म-6 में कोई औपचारिक संशोधन नहीं किया गया। ऐसे में आज की सुनवाई में अदालत के सामने विपक्ष के आरोपों के साथ आयोग का जवाब भी महत्वपूर्ण होगा।

पूरा विवाद क्या है?

भारत में मतदाता सूची तैयार करने और उसे अपडेट रखने की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग की है। चुनाव से पहले या निर्धारित प्रक्रिया के तहत मतदाता सूची की जांच की जाती है, ताकि पात्र नागरिकों के नाम सूची में शामिल हों और अपात्र या गलत एंट्री को हटाया जा सके। इसी प्रक्रिया के तहत निर्वाचन आयोग ने विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR शुरू किया। इस अभियान का उद्देश्य मतदाता सूची की विस्तृत जांच करना और उसमें जरूरी सुधार करना है।

हालांकि, इस प्रक्रिया को लेकर कई राज्यों में सवाल उठे। विपक्षी दलों और कुछ अन्य याचिकाकर्ताओं ने आरोप लगाया कि पुनरीक्षण के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम हटाए गए या उनके नामों की स्थिति पर सवाल खड़े हुए। उन्होंने यह भी आशंका जताई कि उचित सूचना, सुनवाई और नाम दोबारा जुड़वाने की पर्याप्त व्यवस्था के बिना पात्र मतदाता अपने मताधिकार से वंचित हो सकते हैं।

इसके बाद विवाद निर्वाचन आयोग की आंतरिक निर्णय प्रक्रिया तक पहुंच गया। सवाल उठने लगे कि SIR से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले आयोग के तीनों सदस्यों की सहमति से लिए गए थे या नहीं।

चुनाव आयोग के भीतर मतभेद की खबरों से कैसे बढ़ा विवाद?

इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण घटनाक्रम सितंबर 2026 में सामने आया, जब द इंडियन एक्सप्रेस की एक पड़ताल में निर्वाचन आयोग के भीतर मतभेदों का दावा किया गया। रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने अक्टूबर 2025 से अगस्त 2026 के बीच कम से कम 14 मौकों पर कुछ फैसलों और आदेशों को लेकर लिखित आपत्तियां दर्ज की थीं। रिपोर्ट में आरोप लगाया गया कि कुछ कदम दोनों आयुक्तों की जानकारी या सहमति के बिना उठाए गए।

रिपोर्ट में मतदाता सूची के प्रबंधन, नए मतदाताओं को जोड़ने, नाम हटाने और मतदाता डेटा से संबंधित डिजिटल प्रणालियों के संचालन पर उठाई गई आपत्तियों का भी जिक्र था। इन खबरों के सामने आने के बाद निर्वाचन आयोग की निर्णय प्रक्रिया पर सवाल उठने लगे। यदि किसी महत्वपूर्ण फैसले पर आयोग के सदस्यों के बीच मतभेद हों, तो यह जानना जरूरी हो जाता है कि अंतिम निर्णय किस प्रक्रिया के तहत लिया गया और क्या कानूनी प्रावधानों का पालन हुआ।

निर्वाचन आयोग ने अपने जवाब में इन आरोपों को गलत बताया है और कहा है कि SIR से संबंधित फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। इस प्रकार, विवाद का एक बड़ा हिस्सा आयोग के रिकॉर्ड और दोनों पक्षों के दावों की जांच से जुड़ा है।

क्या मुख्य चुनाव आयुक्त अकेले फैसले ले सकते हैं?

यह इस मामले का सबसे महत्वपूर्ण संवैधानिक सवाल है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत चुनावों के अधीक्षण, निर्देशन और नियंत्रण की जिम्मेदारी निर्वाचन आयोग को दी गई है। जब आयोग में मुख्य चुनाव आयुक्त के अलावा अन्य चुनाव आयुक्त भी नियुक्त होते हैं, तो मुख्य चुनाव आयुक्त आयोग के अध्यक्ष होते हैं।

इसका अर्थ यह है कि मुख्य चुनाव आयुक्त का पद आयोग के अध्यक्ष का है, लेकिन आयोग के सामूहिक अधिकार और मुख्य चुनाव आयुक्त के व्यक्तिगत अधिकार एक ही बात नहीं हैं। राकेश कुमार सिंह नाम के याचिकाकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट में दलील दी है कि मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार ने कुछ मामलों में ऐसे अधिकारों का इस्तेमाल किया, जो पूरे निर्वाचन आयोग के सामूहिक निर्णय से जुड़े हैं। याचिका में सवाल उठाया गया है कि क्या ऐसे फैसले अन्य चुनाव आयुक्तों की जानकारी या सहमति के बिना लिए गए।

यहां एक और कानूनी प्रावधान महत्वपूर्ण है। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति, सेवा शर्तों और कार्यकाल से संबंधित 2023 के कानून की धारा 18 आयोग में निर्णय लेने की प्रक्रिया से जुड़ी है। आयोग के सदस्यों के बीच सहमति नहीं होने की स्थिति में निर्णय बहुमत से लिया जा सकता है। याचिकाकर्ताओं की मांग है कि सुप्रीम कोर्ट इन सवालों पर निर्वाचन आयोग की फाइलों, बैठकों के विवरण और अन्य दस्तावेजों की जांच करे।

राहुल गांधी और 12 विपक्षी दलों ने सुप्रीम कोर्ट से क्या मांग की है?

लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी, राज्यसभा में विपक्ष के नेता मल्लिकार्जुन खरगे और अन्य विपक्षी नेताओं ने 12 अक्टूबर 2026 को संयुक्त याचिका दायर की थी। यह याचिका निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और SIR से संबंधित फैसलों को चुनौती देती है।

इस मामले में राहुल गांधी के साथ कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे, समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव, राष्ट्रीय जनता दल के नेता तेजस्वी यादव, एनसीपी (शरदचंद्र पवार) की नेता सुप्रिया सुले और शिवसेना (यूबीटी) के नेता संजय राउत सहित विपक्ष के अन्य नेता शामिल हैं।

याचिका में मुख्य रूप से ये मांगें की गई हैं:

पहली मांग: निर्वाचन आयोग का पूरा रिकॉर्ड अदालत में पेश किया जाए।

विपक्ष चाहता है कि विवादित फैसलों से संबंधित फाइलें, बैठक के एजेंडे, कार्यवृत्त यानी मिनट्स, अधिकारियों की टिप्पणियां और चुनाव आयुक्तों की आपत्तियां अदालत के सामने रखी जाएं। इससे यह जांचने में मदद मिलेगी कि फैसले किस प्रक्रिया के तहत लिए गए।

दूसरी मांग: मतदाता सूची में हुए बदलावों की स्वतंत्र जांच हो।

याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट के एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की अध्यक्षता में स्वतंत्र समिति गठित करने की मांग की है। इस समिति में तकनीकी विशेषज्ञों को भी शामिल करने का प्रस्ताव है। इसका उद्देश्य SIR के दौरान हटाए गए या संशोधित किए गए नामों की जांच करना है।

तीसरी मांग: हटाए गए मतदाताओं की जानकारी सार्वजनिक की जाए।

याचिका में बूथवार उन मतदाताओं की सूची प्रकाशित करने की मांग की गई है, जिनके नाम हटाए गए। साथ ही प्रत्येक नाम हटाने का कारण और उम्र तथा लिंग के आधार पर संबंधित आंकड़े भी उपलब्ध कराने की मांग की गई है।

चौथी मांग: डिजिटल प्रणालियों की जांच हो।

याचिकाकर्ताओं ने ECINet और ERONet जैसी प्रणालियों के संचालन और मतदाता सूची में बदलाव से जुड़े रिकॉर्ड की जांच की मांग की है। उनका कहना है कि इन प्रणालियों के जरिए नाम जोड़ने, हटाने और संशोधित करने की प्रक्रिया की पारदर्शिता सुनिश्चित होनी चाहिए।

याचिका में SIR की प्रक्रिया पर अंतरिम रोक लगाने की मांग भी की गई थी। हालांकि, विपक्ष ने स्पष्ट किया है कि उसकी संयुक्त याचिका का उद्देश्य SIR कराने की निर्वाचन आयोग की सामान्य कानूनी शक्ति को दोबारा चुनौती देना नहीं, बल्कि उससे जुड़े फैसलों की वैधता और प्रक्रिया की जांच कराना है।

यह याचिका सुप्रीम कोर्ट में रिट याचिका संख्या 1351/2026 के रूप में दर्ज है।

असदुद्दीन ओवैसी की याचिका क्यों महत्वपूर्ण है?

इस विवाद में एआईएमआईएम प्रमुख और सांसद असदुद्दीन ओवैसी की याचिका भी शामिल है। उनकी याचिका निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली से जुड़े व्यापक सवालों पर दाखिल अन्य याचिकाओं के साथ सूचीबद्ध है।

ओवैसी सहित अन्य याचिकाकर्ताओं के मामले भी अदालत के सामने हैं। सुप्रीम कोर्ट ने निर्वाचन आयोग से जुड़े कई मामलों को एक साथ सुनने की प्रक्रिया अपनाई है, ताकि एक ही विषय से संबंधित कानूनी सवालों पर समन्वित तरीके से विचार किया जा सके।

फॉर्म-6 का विवाद क्या है?

आज की सुनवाई से पहले निर्वाचन आयोग ने एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दे पर भी अपना पक्ष रखा है। यह विवाद नए मतदाताओं के पंजीकरण के लिए इस्तेमाल होने वाले फॉर्म-6 से संबंधित है।

फॉर्म-6 का इस्तेमाल मतदाता सूची में पहली बार नाम दर्ज कराने के लिए किया जाता है। SIR के दौरान इसके साथ एक अतिरिक्त घोषणा को लेकर विवाद हुआ। इस घोषणा के तहत आवेदक से यह जानकारी मांगी गई कि क्या उसका अपना नाम या उसके माता-पिता अथवा दादा-दादी का नाम पहले की किसी SIR अवधि की मतदाता सूची में दर्ज था।

आलोचकों ने सवाल उठाया कि क्या इस तरह की अतिरिक्त घोषणा से पहली बार मतदाता बनने वाले उन लोगों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं, जिनके परिवारों का नाम पुरानी मतदाता सूची में दर्ज नहीं था। यह भी सवाल उठाया गया कि क्या इस तरह का बदलाव वैधानिक प्रक्रिया का पालन किए बिना किया जा सकता है।

इस पर निर्वाचन आयोग ने अपने हलफनामे में कहा है कि फॉर्म-6 में कोई औपचारिक संशोधन नहीं किया गया। आयोग के अनुसार, फॉर्म में संशोधन करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है और SIR के लिए मांगी गई अतिरिक्त जानकारी एक अलग घोषणा का हिस्सा है।

हालांकि, आयोग ने यह भी स्वीकार किया कि ऑनलाइन आवेदन में जिस तरह इस घोषणा को दिखाया गया, उससे ऐसा लग सकता था कि फॉर्म-6 में बदलाव कर दिया गया है। आयोग के मुताबिक, ऑनलाइन प्रक्रिया में आवेदकों को एक ही बार OTP और ई-साइन की सुविधा देने के लिए दोनों को एक साथ प्रस्तुत किया गया था। अब इस व्यवस्था में बदलाव करते हुए ऑनलाइन आवेदन को दो हिस्सों में बांटने का निर्णय लिया गया है, जैसा कि भौतिक फॉर्म में होता है। यह विवाद इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने की प्रक्रिया ऐसी होनी चाहिए, जिसमें पात्र नागरिकों के लिए अनावश्यक बाधाएं पैदा न हों और कानूनी आवश्यकताओं का भी पालन किया जाए।

निर्वाचन आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में क्या जवाब दिया है?

26 अक्टूबर को दाखिल हलफनामे में निर्वाचन आयोग ने याचिकाकर्ताओं के आरोपों का विरोध किया। आयोग का कहना है कि याचिका मुख्य रूप से एक अखबार की रिपोर्ट पर आधारित है और इस आधार पर लगाए गए आरोपों को स्वीकार नहीं किया जा सकता।

आयोग के प्रमुख तर्क इस प्रकार हैं:

SIR के फैसले सर्वसम्मति से लिए गए: निर्वाचन आयोग ने कहा कि 24 जून 2025, 27 अक्टूबर 2025 और 14 मई 2026 के SIR आदेश आयोग के तीनों सदस्यों की सर्वसम्मत सहमति से जारी किए गए थे।

फाइलों पर टिप्पणियां अंतिम निर्णय नहीं होतीं: आयोग के अनुसार, किसी चुनाव आयुक्त की टिप्पणी, सुझाव या सवाल को अपने आप आयोग का अंतिम निर्णय नहीं माना जा सकता।

जरूरत पड़ने पर इलेक्ट्रॉनिक मंजूरी ली जाती है: आयोग ने कहा कि तत्काल निर्णय लेने की आवश्यकता होने पर सदस्यों की मंजूरी इलेक्ट्रॉनिक तरीके से ली जाती है और बाद में इसे फाइल में दर्ज किया जाता है।

फॉर्म-6 में औपचारिक बदलाव नहीं किया गया: आयोग ने दोहराया कि SIR के लिए इस्तेमाल की जाने वाली अतिरिक्त घोषणा को फॉर्म-6 में संशोधन नहीं माना जाना चाहिए।

डिजिटल रिकॉर्ड में बदलाव अधिकृत अधिकारी के आदेश से होता है: आयोग का कहना है कि ECINet में किसी प्रविष्टि को जोड़ने, हटाने या संशोधित करने का काम संबंधित निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी के आदेश के बिना नहीं होता।

आयोग ने यह भी कहा कि ECINet की कानूनी अनुपालना की जांच के लिए 14 अक्टूबर 2026 को एक समिति गठित की गई, जिसमें IIT मुंबई और IISc बेंगलुरु के दो स्वतंत्र विशेषज्ञों को शामिल किया गया है।

इसके अलावा, आयोग ने कहा कि वह अधिकारियों द्वारा सक्षम प्राधिकारी की मंजूरी के बिना आदेश जारी किए जाने की स्थिति में कार्रवाई करेगा। इस तरह निर्वाचन आयोग का रुख स्पष्ट है- वह आरोपों को गलत मानता है और कहता है कि फैसले निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार लिए गए। अब अदालत के सामने यह तय करने का सवाल है कि उपलब्ध रिकॉर्ड और कानूनी प्रावधानों के आधार पर इन दावों की जांच किस तरह की जाए।

सुप्रीम कोर्ट पहले क्या कर चुका है?

इस विवाद में सुप्रीम कोर्ट पहले भी कई महत्वपूर्ण कदम उठा चुका है।

5 अक्टूबर 2026: अदालत ने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और SIR से जुड़े सवालों पर दाखिल याचिकाओं पर सुनवाई की। राकेश कुमार सिंह की याचिका में मुख्य चुनाव आयुक्त की भूमिका पर सवाल उठाए गए थे। अदालत ने निर्वाचन आयोग से जवाब मांगा। उस समय अदालत ने मुख्य चुनाव आयुक्त को तत्काल निलंबित करने जैसी राहत देने के बजाय पहले प्रामाणिक जानकारी हासिल करने की जरूरत पर जोर दिया।

12 अक्टूबर 2026: राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खरगे और अन्य विपक्षी नेताओं ने निर्वाचन आयोग की कार्यप्रणाली और SIR से जुड़े फैसलों की जांच की मांग करते हुए संयुक्त याचिका दाखिल की।

15 अक्टूबर 2026: सुप्रीम कोर्ट ने राहुल गांधी और अन्य विपक्षी नेताओं की याचिका पर निर्वाचन आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार तथा अन्य संबंधित चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया। अदालत ने संबंधित मामलों को एक साथ सुनने की प्रक्रिया भी अपनाई।

इसी सुनवाई के दौरान विपक्षी नेताओं के सुप्रीम कोर्ट तक मार्च से संबंधित अलग मामले का भी जिक्र हुआ। अदालत ने कहा कि न्यायपालिका पर दबाव बनाने की कोशिश नहीं की जानी चाहिए। हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि नोटिस जारी करने का अर्थ किसी पक्ष की निंदा करना नहीं है।

26 अक्टूबर 2026: निर्वाचन आयोग ने अपना जवाब दाखिल किया। इसी दिन सुप्रीम कोर्ट में दिल्ली में चल रहे SIR से संबंधित एक अन्य मामले की जल्द सुनवाई की मांग भी उठी। अदालत ने उसे निर्धारित तारीख से पहले सुनने से इनकार करते हुए 28 अक्टूबर को सूचीबद्ध मामले पर आदेश का इंतजार करने को कहा। यह दिल्ली SIR से संबंधित अलग कार्यवाही है, जिसे आज की संयुक्त याचिकाओं के साथ भ्रमित नहीं करना चाहिए।

प्रकाशित: मंगलवार, 27 अक्टूबर 2026 | 1:57 PM IST

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