कलकत्ता हाई कोर्ट ने निलंबित चल रहे एक पुलिसकर्मी को बड़ी राहत दे दी है। करीब 6 साल पहले सस्पेंड होने के बाद उच्च न्यायालय ने उन्हें बहाल कर दिया है। खबर है कि लोकसभा सांसद अभिषेक बनर्जी की नाराजगी के चलते उन्हें हटाया गया था। हालांकि, इसे लेकर आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा गया है। अभिषेक बनर्जी विदेश में आंख का इलाज कराने गए थे।
संघवाद प्रतिदिन की रिपोर्ट के अनुसार, मामला 2023 का है। तब पुलिस ड्राइवर अपनी कार निकाल रहे थे। उस दौरान गाड़ी अविभाजित रही तृणमूल कांग्रेस के सासंद अभिषेक बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास के गेट से टकरा गई थी। इसके बाद उन्हें काम से हटा दिया गया था। खबर है कि राज्य सरकार के फैसले को उच्च न्यायालय ने पलट दिया है।
क्या बोला हाई कोर्ट रिपोर्ट के अनुसार, हाई कोर्ट में जस्टिस तपोब्रता चक्रवर्ती और जस्टिस पार्थ प्रतिम रॉय की डिवीजन बेंच इस मामले की सुनवाई कर रही थी। बेंच ने पुलिस विभाग को 4 सप्ताह के अंदर नए आदेश जारी करने के लिए कहा है। कोर्ट ने कहा कि पुलिसकर्मी ने गलती की थी, लेकिन गलती इतनी गंभीर नहीं थी कि उसे काम से ही हटा दिया जाए।
कोर्ट ने यह भी कहा कि ऐसे भी कोई आरोप नहीं हैं कि हादसे में कोई घायल हो गया था। बेंच ने कहा कि इस मामले में कम सजा देने की भी गुंजाइश थी। रिपोर्ट के अनुसार, ड्राइवर का नाम धीरेंद्रनाथ महतो है और उन्होंने साल 2000 में एक ड्राइवर के तौर पर कोलकाता पुलिस में शुरुआत की थी। बाद में 2005 में उन्हें हार्ट अटैक आया और उन्हें हल्की और मध्यम स्तर की जिम्मेदारियां दी जाने लगी थीं।
अभिषेक बनर्जी CEC पर बरसे बुधवार को बनर्जी ने पोस्ट किया, 'मुख्य निर्वाचन आयुक्त को तुरंत हटाया जाना चाहिए और अदालत की निगरानी में जांच के आदेश दिए जाने चाहिए।' उन्होंने आरोप लगाया कि 'कथित तौर पर एक राजनीतिक दल को लाभ पहुंचाने के लिए लाखों मतदाताओं को मताधिकार से वंचित करना हमारे लोकतंत्र की नींव पर प्रहार है' और इसके लिए जिम्मेदार लोगों की जवाबदेही तय की जानी चाहिए।
अभिषेक ने कहा, 'पश्चिम बंगाल चुनावों के बाद, INDIA गठबंधन के सभी विपक्षी दलों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश और उच्चतम न्यायालय के न्यायाधीशों को पत्र लिखकर गंभीर चिंताएं जताई थीं।' उन्होंने कहा कि इन आरोपों की 'न तो जांच की गई और न ही इन्हें वह तवज्जो दी गई जिसके वे हकदार थे।'
सांसद ने कहा, 'जब लोकतांत्रिक प्रक्रिया को प्रभावित करने वाले गंभीर सवाल बार-बार उठाए जाते हैं और फिर भी अनसुने रह जाते हैं तो इससे संस्थागत निष्पक्षता पर सवाल उठना तय है।' उन्होंने कहा, उच्चतम न्यायालय इस मामले से मुंह नहीं मोड़ सकता। अंतिम जिम्मेदारी उसी की है।' उन्होंने सवाल किया, 'क्या मुख्य न्यायाधीश की अगुवाई वाली पीठ इस पर कार्रवाई करेगी?'

