जस्टिस कौल ने 2018 के सुप्रीम कोर्ट के जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस को बताया 'भूकंप'

पूर्व CJI चंद्रचूड़ पर लगे आरोप और न्यायपालिका में मतभेद हुए उजागर।

एक व्यक्ति सूट और टाई पहने हुए माइक्रोफ़ोन के सामने खड़ा है।
जस्टिस संजय किशन कौल की किताब में 2018 की प्रेस कॉन्फ्रेंस को 'भूकंप' बताया गया है।
मुख्य बातें

जस्टिस संजय किशन कौल ने 12 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के जजों द्वारा की गई प्रेस कॉन्फ्रेंस को 'भूकंप' बताया है, क्योंकि इससे न्यायपालिका के भीतर के मतभेद और 'फाल्ट लाइन्स' सार्वजनिक हो गईं।

  • जस्टिस संजय किशन कौल ने अपनी किताब में 2018 की प्रेस कॉन्फ्रेंस को 'भूकंप' कहा है।
  • उन्होंने कहा कि पूर्व CJI चंद्रचूड़ कॉलेजियम में सरकार से सहमति लेते थे और दबाव में फैसले लेते थे।
  • जस्टिस रंजन गोगोई, चेलामेश्वर, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ ने प्रेस कॉन्फ्रेंस की थी।
  • जजों ने आरोप लगाया था कि तत्कालीन चीफ जस्टिस मनमर्जी से रोस्टर बनाते थे।
  • जस्टिस लोया की मौत का मामला जानबूझकर जस्टिस अरुण मिश्रा की बेंच को दिया गया था।
  • वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ के कार्यकाल को 'स्वर्णिम काल' बताया।

सुप्रीम कोर्ट के पूर्व जज जस्टिस संजय किशन कौल की किताब में किए गए दावों की वजह से खलबली मच गई है। उन्होंने कहा कि पूर्व सीजेआई चंद्रचूड़ कॉलेजियम में चर्चा से पहले सरकार से सहमति लेते थेऔर सरकार के दबाव में फैसले लेते थे। उन्होंने अपनी किताब में कहा कि 12 जनवरी 2018 को सुप्रीम कोर्ट के सीनियर जजों की प्रेस कॉन्फ्रेंस एक भूकंप की तरह थी। इससे न्यायपालिका की फाल्ट लाइन्स खुलकर सामने आ गईं।

आपको बता दें कि जस्टिस रंजन गोगोई, जस्टिस चेलामेश्वर, मदन लोकुर और कुरियन जोसेफ ने एक प्रेस कॉन्फ्रेंस करके आरोप लगाया था कि तत्कालीन चीफ जस्टिस अपनी ताकत का इस्तेमाल करके मनमर्जी से रोस्टर बनाते हैं और उन्हें अपने मनचाहे तरीके से कैसे असाइन करते हैं।

लोगों को पता चल गया जजों के बीच का मतभेद

द ट्रिब्यून ने किताब के हवाले से बताया, इस प्रेस कॉन्फ्रेंस से कोई भी फायदा नहीं मिला बल्कि लोगों को पता चल गया कि सुप्रीम कोर्ट में जजों के बीच मतभेद है । हालांकि जजों को भी अपनी शिकायतों और समस्याओं को सामने रखने का अधिकार है। हालांकि इस तरह से प्रेस कॉन्फ्रेंस करना मेरी समझ से बाहर था। हालांकि जो नुकसान होना था हो चुका था। फाल्ट लाइन सबके सामने आ चुकी थी।

इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में बताने की कोशिश की कई कि सीजेआई भी सुपीरियर नहीं होते बल्कि सभी लोगों में बराबर होते हुए भी उन्हें सिर्फ पहले स्थान पर रखा जाता है। ऐसे में उन्हें कोई भी फैसला लेते समय सबकी सहमति लेनी होती है। जजों ने आरोप लगाया था कि जस्टिस लोया की मौत के मामले को जानबूझकर केवल जस्टिस अरुण मिश्रा की बेंच को दिया गया, जबकि इसकी कोई पुख्ता वजह नहीं थी।

जस्टिस संजय किशन कौल ने अपनी किताब में लिखा, 'यह प्रेस कॉन्फ्रेंस एक भूकंप की तरह थी। इस तरह की घटना इससे पहले 1973 में हुई थी जब तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने चीफ जस्टिस और सीनयर जजों की नियुक्ति में सीनियॉरिटी की अनदेखी की थी और तीन जजों को अनदेखा करदिया था। इनमें जस्टिस जेएम शेलाट, केएस हेगड़े और एएन ग्रोवर का नाम था। उन्होंने जस्टिस एएन रे को नियुक्त किया था। इसके बाद तीन जजों ने इस्तीफा दे दिया था। इसके बाद 1977 में एक बार फिर जस्टिस एचआर खन्ना को सीजेआई बनाया गया।'

क्या कहते हैं जानकार

संविधान संबंधी मामलों के विशेषज्ञ और वरिष्ठ अधिवक्ता राकेश द्विवेदी ने पूर्व प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ के कार्यकाल को भारतीय न्यायपालिका का ''स्वर्णिम काल' बताया। उन्होंने न्यायिक नियुक्तियों के मामलों में न्यायमूर्ति चंद्रचूड़ के सरकार के प्रति जरूरत से ज्यादा विनम्र होने के आरोप को खारिज किया।

वहीं, सुप्रीम कोर्ट बार एसोसिएशन (एससीबीए) के पूर्व अध्यक्ष और वरिष्ठ अधिवक्ता विकास सिंह ने कौल की आलोचना का समर्थन किया। उन्होंने आरोप लगाया कि सरकार के प्रति तत्कालीन प्रधान न्यायाधीश चंद्रचूड़ के रवैये और संवेदनशील मामलों के पीठ आवंटन से निपटने के उनके तरीके ने न्यायिक स्वतंत्रता के प्रति उनकी कार्यशैली पर सवाल खड़े किए।

प्रकाशित: सोमवार, 26 अक्टूबर 2026 | 11:37 AM IST

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