भारत ने अपनी पनडुब्बियों की पानी के भीतर लंबे समय तक काम करने की क्षमता बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाया है। रक्षा अनुसंधान एवं विकास संगठन (DRDO) की नौसेना सामग्री अनुसंधान प्रयोगशाला द्वारा विकसित स्वदेशी एयर इंडिपेंडेंट प्रोपल्शन (AIP) प्रणाली के एनर्जी मॉड्यूल ने 24 अक्टूबर को Setting to Work Phase-2 चरण में प्रवेश किया। यह कार्यक्रम गुजरात के हजीरा स्थित एलएंडटी के ए.एम. नाइक हेवी इंजीनियरिंग कॉम्प्लेक्स में आयोजित हुआ।
यह तकनीक क्यों महत्वपूर्ण है? पारंपरिक डीजल-इलेक्ट्रिक पनडुब्बियों को बैटरी चार्ज करने के लिए समय-समय पर सतह के करीब आना या स्नॉर्कलिंग करना पड़ता है। AIP प्रणाली उन्हें वायुमंडलीय ऑक्सीजन पर निर्भरता कम करके अधिक समय तक पानी के भीतर रहने में मदद करती है। इससे पनडुब्बियों की गुप्त रूप से संचालन करने की क्षमता और समुद्र में टिके रहने की अवधि बेहतर हो सकती है।
रक्षा मंत्रालय के अनुसार, अगले चरण में एनर्जी मॉड्यूल से बिजली उत्पादन शुरू कर नौसेना के निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत कठोर परीक्षण किए जाएंगे। इसके बाद इसे 2027 की शुरुआत में कलवरी श्रेणी की पनडुब्बी में एकीकरण के लिए मझगांव डॉक शिपबिल्डर्स लिमिटेड को सौंपने की योजना है। इसका अर्थ है कि यह एक अहम विकासात्मक उपलब्धि है, लेकिन प्रणाली का अंतिम परिचालन उपयोग आगे के परीक्षणों और एकीकरण पर निर्भर करेगा।
भारत के लिए इसका क्या महत्व है?
रक्षा में आत्मनिर्भरता: पनडुब्बियों की महत्वपूर्ण तकनीक देश में विकसित करने की दिशा में प्रगति।
बेहतर गुप्त संचालन: पानी के भीतर ज्यादा समय बिताने की क्षमता से परिचालन लाभ मिल सकता है।
स्वदेशी उद्योग को बढ़ावा: DRDO, भारतीय नौसेना और औद्योगिक भागीदारों के सहयोग से तकनीक को विकसित करने का अवसर।
प्रकाशित: रविवार, 25 अक्टूबर 2026 | 3:18 PM IST

