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20 बागी टीएमसी सांसदों पर स्पीकर के फैसले में देरी क्यों? SC ने जताई चिंता

सुप्रीम कोर्ट ने अयोग्यता याचिकाओं पर 3 महीने से अधिक की देरी पर गंभीर रुख अपनाया।

झटपट समझें

सुप्रीम कोर्ट ने टीएमसी के 20 बागी सांसदों की अयोग्यता याचिकाओं पर लोकसभा अध्यक्ष द्वारा तीन महीने से अधिक की देरी पर चिंता जताई है, इसे लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए एक रेड फ्लैग करार दिया है।

मुख्य बातें

  • 20 बागी टीएमसी सांसदों की अयोग्यता याचिकाएं 3 महीने से स्पीकर के पास लंबित हैं।
  • सुप्रीम कोर्ट ने फैसले में देरी को चिंताजनक और रेड फ्लैग बताया।
  • अयोग्यता की प्रक्रिया लंबित रहने के गंभीर परिणाम हो सकते हैं।
  • अदालत ने पुराने फैसलों का हवाला देते हुए 3 महीने की समय-सीमा याद दिलाई।
  • स्पीकर को निष्पक्ष सुनवाई के लिए बागी सांसदों को मौका देना चाहिए।
  • कोर्ट ने फिलहाल कोई निश्चित डेडलाइन तय नहीं की है।
एक आदमी और भारत का सर्वोच्च न्यायालय
लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के समक्ष लंबित याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई की।

तृणमूल कांग्रेस (TMC) के 20 बागी सांसदों को अयोग्य घोषित करने वाली याचिकाएं लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला के पास तीन महीने से लंबित पड़ी हुई हैं। आज इस मामले पर देश की सर्वोच्च अदालत में सुनवाई हुई। स्पीकर के द्वारा अंतिम फैसला लेने में हो रही देरी पर सुप्रीम कोर्ट ने गंभीर रुख अपनाया और इसे चिंताजनक करार दिया है। देश के मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत (CJI Surya Kant), न्यायमूर्ति जोयमाल्या बागची और न्यायमूर्ति वी. मोहना की पीठ टीएमसी सांसद अभिषेक बनर्जी द्वारा दायर उस याचिका पर सुनवाई कर रही थी जिसमें बागी सांसदों की अयोग्यता पर जल्द फैसला लेने की मांग की गई है।

सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अयोग्यता की प्रक्रिया लंबित रहने के कई तरह के गंभीर परिणाम हो सकते हैं। अदालत ने कहा, "तीन महीने का समय बीत चुका है और याचिकाकर्ता की यह बात जायज है कि इतना वक्त लगना एक रेड फ्लैग है। जब मामला बेहद संवेदनशील हो और इसका असर देश की लोकतांत्रिक प्रक्रिया और अन्य कार्यवाहियों पर पड़ रहा हो तो इतने समय में कार्रवाई पूरी क्यों नहीं हुई?"

क्या है पूरा विवाद? जून महीने में टीएमसी के 20 लोकसभा सांसदों ने पार्टी से अलग होकर नेशनल क्रिश्चियन पीपुल्स ऑफ इंडिया (NCPI) में शामिल होने का ऐलान किया था। इसके बाद स्पीकर से एक अलग गुट के रूप में मान्यता मांग की गई थी। इसके जवाब में अभिषेक बनर्जी ने 18 जून को लोकसभा अध्यक्ष के सामने 20 अलग-अलग अयोग्यता याचिकाएं दायर की थीं। उन्होंने दल-बदल विरोधी कानून का हवाला देते हुए कहा कि इन सांसदों ने स्वेच्छा से TMC की सदस्यता छोड़ी है इसलिए इन्हें अयोग्य ठहराया जाना चाहिए।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने पुराने फैसलों का संदर्भ देते हुए याद दिलाया कि असाधारण परिस्थितियों को छोड़कर अयोग्यता याचिकाओं का निपटारा 3 महीने की समय-सीमा के भीतर हो जाना चाहिए।

अदालत में तीखी बहस टीएमसी की ओर से पेश वरिष्ठ अधिवक्ता कल्याण बनर्जी ने कोर्ट को बताया कि स्पीकर ने 5 अगस्त को बागी सांसदों को नोटिस जारी कर 14 दिनों में जवाब मांगा था। हालांकि, सांसदों द्वारा और वक्त मांगे जाने पर यह समय-सीमा 22 सितंबर तक बढ़ा दी गई और अब फिर से अतिरिक्त समय मांगा जा रहा है। उन्होंने कहा कि इस मामले को अनिश्चितकाल के लिए लटकाया नहीं जा सकता। वहीं, लोकसभा अध्यक्ष की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल (SG) तुषार मेहता ने अदालत द्वारा कोई समय-सीमा तय किए जाने का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि अध्यक्ष एक संवैधानिक पद पर हैं और निष्पक्ष सुनवाई के लिए बागी सांसदों को अपनी बात रखने का पूरा मौका मिलना चाहिए

कोर्ट ने नहीं बांधी समय-सीमा पीठ ने माना कि लोकसभा अध्यक्ष एक उच्च संवैधानिक पद है। हर मामले में अलग समय लग सकता है। न्यायमूर्ति बागची ने कहा कि अदालत कोई कड़ा नियम नहीं थोप रही बल्कि स्पीकर को उनकी संवैधानिक जिम्मेदारी की याद दिला रही है। अदालत ने फिलहाल फैसले के लिए कोई निश्चित डेडलाइन तय नहीं की है, लेकिन याचिका को खारिज करने के बजाय लंबित रखा है ताकि अध्यक्ष द्वारा की जा रही प्रगति की समीक्षा की जा सके।

बागी सांसदों द्वारा जवाब दाखिल करने के लिए 4 हफ्ते का अतिरिक्त समय मांगे जाने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले की अगली सुनवाई 6 सप्ताह बाद तय की है।

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