सरकार की अड़चन, 800 से अधिक अधिकारी SC पहुंचे: CRPF-CISF में IPS की तैनाती पर विवाद

केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में IPS अधिकारियों की तैनाती को लेकर केंद्र सरकार और 800 से अधिक अधिकारियों के बीच टकराव बढ़ा।

भारत के सर्वोच्च न्यायालय के सामने फव्वारे के पास खड़े लोगों की मूर्ति।
केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों में IPS अधिकारियों की तैनाती को लेकर चल रहे विवाद पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हुई।
मुख्य बातें

केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) में IPS अधिकारियों की तैनाती को लेकर केंद्र सरकार और 800 से अधिक अधिकारियों के बीच विवाद है, जिसे लेकर अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है।

  • 800 से अधिक CAPF अधिकारियों ने नए कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी है।
  • अधिकारियों का आरोप है कि नया कानून 2025 के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को बेअसर करता है।
  • नए कानून से महानिदेशक (DG) और विशेष महानिदेशक (SDG) के 100% पद IPS के लिए आरक्षित हैं।
  • सरकार का तर्क है कि IPS अधिकारी CAPF अभियानों के समन्वय के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • सरकार ने कहा कि IPS अधिकारी भी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों और खुफिया एजेंसियों में सेवा देते हैं।

Supreme Court News: केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बलों (CAPF) में भारतीय पुलिस सेवा यानी कि आईपीएस (IPS) अधिकारियों की तैनाती को लेकर विवाद फिर गहरा गया है। इस मामले में केंद्र सरकार और सैकड़ों अधिकारी आमने-सामने हैं। सुप्रीम कोर्ट में आज केंद्रीय सशस्त्र पुलिस बल (सामान्य प्रशासन) अधिनियम, 2026 की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिका पर सुनवाई होनी है।

यह याचिका केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF), सीमा सुरक्षा बल (BSF), केंद्रीय औद्योगिक सुरक्षा बल (CISF), भारत-तिब्बत सीमा पुलिस (ITBP) और सशस्त्र सीमा बल (SSB) के 800 से अधिक अधिकारियों ने दाखिल की है। इनमें से कई अधिकारी ऐसे भी हैं जो शौर्य चक्र और कीर्ति चक्र जैसे देश के सर्वोच्च वीरता पुरस्कारों से सम्मानित हैं।

क्या है पूरा मामला, क्यों है आपत्ति? याचिकाकर्ताओं का आरोप है कि केंद्र सरकार ने 23 मई 2025 को आए सुप्रीम कोर्ट के उस ऐतिहासिक फैसले को बेअसर करने के लिए यह नया कानून बनाया है। इसमें सुप्रीम कोर्ट ने CAPF में IPS अधिकारियों की डेपुटेशन को चरणबद्ध तरीके से कम करने का आदेश दिया था। याचिकाकर्ताओं का नेतृत्व CRPF के शौर्य चक्र विजेता असिस्टेंट कमांडेंट विभोर कुमार सिंह कर रहे हैं।

अधिकारियों का कहना है कि शीर्ष पदों पर बाहरी यानी कि IPS अधिकारियों को सीधे बैठाने से वर्षों तक अपनी जान जोखिम में डालकर सेवा देने वाले कैडर अधिकारियों के प्रमोशन के रास्ते बंद हो जाते हैं। उनका कहना है कि नए कानून से महानिदेशक (DG) और विशेष महानिदेशक (SDG) पर 100 प्रतिशत IPS अधिकारियों की ही तैनाती का प्रावधान किया गया है। इससे पूरे जीवन सेवा देने के बाद भी कोई कैडर अधिकारी बल का प्रमुख नहीं बन सकता है।

CAPF अधिकारियों का कहना है कि उनकी मुख्य जिम्मेदारी देश की सीमाओं की सुरक्षा करना, आतंकवाद और नक्सलवाद से निपटना है। इसके लिए विशेष सैन्य प्रशिक्षण की जरूरत होती है। जबकि IPS अधिकारियों का मुख्य अनुभव राज्यों में कानून-व्यवस्था और पुलिसिंग तक सीमित होता है।

सरकार का क्या है पक्ष? केंद्रीय गृह मंत्रालय ने अदालत में 77 पन्नों का हलफनामा दायर कर इस कानून का बचाव किया है। सरकार का कहना है कि संसद को कानून में बदलाव करने का पूरा अधिकार है और नया कानून सुप्रीम कोर्ट के पुराने फैसले के आधार को बदलता है न कि अदालत के अधिकार का उल्लंघन करता है। सरकार ने अपने हलफनामे में कहा कि IPS अधिकारी राज्य और केंद्र के बीच एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में काम करते हैं। स्थानीय प्रशासन और पुलिस के साथ CAPF अभियानों के बेहतर समन्वय के लिए शीर्ष पदों पर IPS अधिकारियों की मौजूदगी बेहद जरूरी है।

IPS के पास अनुभव की कमी नहीं सरकार ने इस तर्क को खारिज किया कि IPS अधिकारियों के पास सुरक्षा अभियानों का अनुभव नहीं होता। सरकार के मुताबिक IPS अधिकारी भी नक्सल प्रभावित क्षेत्रों, सीमावर्ती जिलों और खुफिया एजेंसियों में अपनी सेवा देते हैं।

आपको बता दें कि संसद के दोनों सदनों से पास होने के बाद सरकार ने 8 अक्टूबर को इस कानून को अधिसूचित किया था।

प्रकाशित: गुरुवार, 15 अक्टूबर 2026 | 1:18 PM IST

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